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इस नाम तक मुझे मेरे एक प्रिय दोस्त ने पहुँचाया था। बच्चों और वयस्कों के लिए किताबें चुनना, उन्हें एक परिपक्व पाठक बनते देखना – इस तरह के कामों में जुड़ने से खुद के पाठक होने के मायने बने, मायने खुले। और इस बनने में, खुलने में, विनोद जी की रचनाओं का साथ रहा। साथ रहा, हाथ रहा कहने से अलग है। साथ में एक रिश्ता है जिसके पास बार-बार लौटा जा सके, जिसमें दोस्ती की गर्मजोशी का एहसास और एक साक्षी भाव है। साथ, मानवता की बुनियादी ज़रुरत है और यह ज़रूरत सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) है। इस साथ को विनोद जी की एक मेरी बहुत पसंदीदा रचना कुछ ऐसे दर्शाती है कि:
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।
Picture credit: Wikimedia Commons
रचनाकार के लिए उसकी रचना ही उसका रास्ता बनती हैं पाठकों तक पहुँचने के लिए और हम जैसे कईं पाठक इन रचनाओं के ज़रिये ही रचनाकारों के बारे में थोड़ा कुछ जान-समझ पाते हैं। विनोद जी की रचनाओं में जीवन का ऐसा बोध झलकता महसूस होता है जो साधारण को असाधारण बनाता और ठीक उलट देता है; जब वह पूछते हैं कि “बनते कहाँ दिखा आकाश” (कविता: बना बनाया देखा आकाश) और जब वह मानते हैं कि “किसी नए अधूरे को अंतिम न माना जाए” (कविता: कोई अधूरा पूरा नहीं होता)। इन और इन जैसी कईं कविताओं में एक विचित्र मौन है, जो कल्पना को केंद्र में रखते हुए पढ़ने वाले को एक बाहरी और भीतरी भ्रमण पर लेकर जाती हैं, जहाँ से लौटकर, पढ़ने वाले एक चुप्पी से भर जाए, एक खाली से भर जाए। यह चुप्पी, रचना समझने के सीमित दायरे को विस्तार देती है। आमतौर पर रचनाओं पर समझ के दायरे का बोझ रहता है और इसी बोझ को एक पाठक भी ढोता है। और यहीं पे उस साथ की ज़रुरत पड़ती है जिसका विनोद जी की रचनायें आश्वासन देती हैं; कि इसपे फिर से लौटने का विश्वास, अर्थ की गहराईयों में गोते लगाकर, झूझने का विश्वास और डूबकर, उतरकर उभरने का विश्वास।
उनकी कहानी गोदाम में भी कईं ऐसे एहसास हैं – एक किरायदार जो एक मकान से इसलिए प्रेम करता है क्यूंकि वहां एक पेड़ है। इस प्रेम की अनुभूति, उस प्रेम से बिछड़ने की असहायता ही उस मौन की ओर लेकर जाती है जिसे विनोद जी शायद वैसे ही जी रहे होंगें जब उस प्रेम से बिछड़े होंगें।
यह एक और कविता:
घर-बार छोड़कर संन्यास नहीं लूंगा
अपने संन्यास में
मैं और भी घरेलू रहूंगा
घर में घरेलू
और पड़ोस में भी।
एक अनजान बस्ती में
एक बच्चे ने मुझे देखकर बाबा कहा
वह अपनी माँ की गोद में था
उसकी माँ की आँखों में
ख़ुशी की चमक थी
कि उसने मुझे बाबा कहा
एक नामालूम सगा।
जीवन को समझे जाने के लिए समझने की होड़ में नहीं उतरना होता; उसे रूककर, ठहरकर, महसूस करते हुए रहा जाए और ये सब करने के लिए विनोद जी की कवितायेँ न्योता देती रहीं हैं। उनके लिखे उपन्यासों को पढ़ने का सफर अभी शुरू नहीं हुआ है। उनमें भी ये सारे न्योते और कईं और न्योते होंगें, इसका यक़ीन है।
ये मौके हम सबके लिए बनाने का विनोद जी को शुक्रिया।
और शुक्रिया विनोद कुमार शुक्ल का, अपने मौन को रचने के लिए।
आखरी में यह कहना ज़रूरी है कि ये सब विचार एक छोटी खिड़की भर है जिससे विनोद जी के रचना संसार को देखना हुआ; यह खिड़की अभी और खुलेगी, अभी और विस्तृत होगी। शायद इस खिड़की के पार जाकर, घर से बाहर निकलकर उस संसार में प्रवेश किया जायेगा जो अनंत है।
निधि क़ाज़ी
पराग, टाटा ट्रस्ट्स
यह लेख पहले मराठी में प्रकाशित हुआ था। आप इसे यहाँ पढ़ सकते हैं।
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