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पूँछ के ऊपर इस मनोरंजक कविता में बंदर, लंगूर, बिल्ली, नीलगाय, शेर और आदमी—सब शामिल हैं। गुलज़ार की चुटीली भाषा हो और हँसता-चिलखता मिसप्रिंट का इस्तेमाल डिज़ाइन में बड़े प्रयोगात्मक और आकर्षक ढंग से किया गया हो, तो कौन है जो इस किताब को चुनना, पढ़ना और गुनगुनाना न चाहेगा।
चित्रों में गणितीय संरचना और बारीक काम का सुंदर प्रदर्शन है। वाइट स्पेस का प्रभावशाली उपयोग आँखों को घूमने और दिमाग़ को सोचने की गुंजाइश देता है। ऐसी चित्र-पुस्तकें सुकून देती हैं।
लोकभाषा में रची यह कविता यथार्थ और कल्पना का अद्भुत सम्मिश्रण है। इसमें भैंस की पाड़ों की खूबसूरती, फुर्ती, दौड़ और चंचलता—सबका मोहक वर्णन मुखर लय और सुगठित छंद के माध्यम से, तथा दैनिक बिंबों के सहारे किया गया है। इसका पूरा आनंद कविता के सस्वर पाठ से ही मिल सकता है।
“धुन्ना कै पँड़िया” जीव-जगत के सौंदर्य का समारोह है और साथ के चित्र-रंग तथा गति-अंकन पाड़ी के सौन्दर्य का नायाब मूर्तन।
“जब धूप भी हो और बारिश भी” वाली मज़ेदार कहावत हम सबने बचपन में सुनी है – और इसी को गुलज़ार ने अपनी कल्पना से और भी दिलचस्प बना दिया है। यह प्यारी-सी कविता धूप, बारिश और गीदड़ों की दुनिया को नए रंगों में दिखाती है। भाषा में खेल और संप्रेषणीयता है – हल्की-सी शरारत, लय और ताज़गी के साथ।
चित्र नाटकीय, बोल्ड और बेहद व्यंजक हैं। डबल-स्प्रेड पर फैला स्पेस धूप-बारिश का पूरा मौसम रच देता है। गीदड़, हाथी और बाकी जीव इतने जीवंत दिखते हैं कि लगता है जैसे कहानी पन्नों से बाहर आ रही हो।
ऊटपटांग: जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है, यह किताब बेतुकी या नॉनसेंस कही जाने वाली कविताओं की बेहद मज़ेदार किताब है। यह एक टाँग वाले मुर्ग़े से शुरू होकर तुक की ज़रूरत के मुताबिक़ इस तरह बनती चलती है कि इसे एक अखंड कविता की तरह भी पढ़ा जा सकता है और कविता-श्रृंखला की तरह भी। बेमेल चीज़ें कल्पना-लोक में सहज ही घुलमिल जाती हैं। इसकी लय लोकगीतों या बुझौवल की याद दिलाती है और भाषा का खेल देखते ही बनता है। चित्रांकन कविताओं को साकार करते हुए उन्हें विस्तार भी देता है।
यह हिन्दी की कालजयी बाल कविताओं का अनूठा संकलन है जहाँ वे कविताएँ भी हैं जिन्हें आज के बच्चों के दादा के दादाओं ने अपने बचपन में पढ़ा था और वैसी कविताएँ भी हैं जो पहली बार किसी संकलन में प्रकाशित हो रही हैं किंतु जिन सब को आज से सौ साल बाद भी इतने ही प्यार से पढ़ा और सुना जाएगा। यहाँ भाषा और शब्दों के खेल हैं, तुकों की अप्रत्याशित बंदिशें हैं और संगीत का धमाल है। आस पास का दैनन्दिन जीवन है तो आकाश पाताल की गप्पें भी। हर बच्चे, और हर सयाने, के हाथ में यह किताब होनी ही चाहिए।
यह छोटी-छोटी कविताओं का संग्रह है जिन्हें एक ही कवि ने लिखा है। यह बहुत प्यारी कविताओं का संग्रह है जो आस-पास के विषयों को आधार बनाकर रची गई हैं। छंदोबद्ध हैं और लय इतनी सरल कि तुरंत कंठस्थ हो जाएँ। ऐसी निर्दोष कविताएँ कम देखने को मिलती हैं। चित्रांकन भी प्रभावकारी है और कविता की संगत करता है। इन कविताओं की एक खूबी उनकी भाषा का कौतुक भी है जो कल्पना को नयी उड़ान देता है।
कविता लयात्मक और सुमधुर है। सुमधुर ध्वनियों और आनुप्रासिक प्रयोगों के कारण पढ़ना सीख रहे शुरुआती पाठक इस किताब की ओर आकर्षित होंगे। ‘अकॉर्डियन फोल्ड’ के कारण इस किताब को पलटने में भी एक खेल है। अर्थ के स्तर पर भी यह एक अच्छी कविता है। भाव के स्तर पर कविता में स्वतंत्रता और खुलेपन का भाव है। अपने अनूठे डिज़ाइन, सांगीतिक भाषिक प्रयोगों और खुलेपन के भाव के कारण यह इस वर्ष प्रकाशित हुई किताबों में एक अच्छी किताब है।
इस संकलन से पता चलता है कि सस्ती छपी किताबें भी कितनी सुरुचिपूर्ण हो सकती हैं। प्रभात और सुशील की कविताएं बहुत अच्छी हैं। अच्छी किताब का फोर कलर में होना कतई ज़रूरी नहीं। प्रोइती राय के चित्रों में बच्चों के चित्रों की सी सहजता है।