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Stories-within-stories, all emerging from a tree who knows about the struggles of displacement and its emotional and ecological impact on people. Sabri loves to draw but paints are expensive, and Shankar tells stories to get through tough situations. The children ask questions and the tree tells fables which critique power and progress. Sabri and her pack of friends will take you through a range of emotions from anger and despair to humour.
यह किताब खिचड़ीपुर मोहल्ले और वहाँ के बाशिंदों का एक सजीव दस्तावेज़ है—उनकी ही आवाज़ में। किरदार, उनके दुख–सुख और रोज़मर्रा की बयानगी बिना किसी परत या सजावट के सामने आती है। गाज़ीपुर के कूड़ा पहाड़ के पास बसे रिहायशी इलाके में रहने वाले बच्चों की नज़र से शहर, मोहल्ला और उसका सामाजिक-सांस्कृतिक जगत खुलता है। लेखकों की विशेषता यह है कि वे अपने ही परिवेश से दूरी बनाकर उसे साफ़, बारीक और ईमानदार ढंग से रेखांकित करते हैं।
भाषा की संभावनाओं से पहली परिचयात्मक कविता के माध्यम से ही होती है। प्रवीणता की रंगीन भाषा और रोज़मर्रा की चीज़ों पर उनका खूबसूरत नजरिया, राया के व्यंजक चित्रों के साथ मिलता है, तो ऐसी मनोहरी किताब बनती है। कहानी का मज़ा बढ़ाने के लिए यह मधुर प्रस्तुति बेहतरीन उदाहरण है, जिसमें सरलता में भी गहराई होती है।
यह कविता अपनी भाषा और चित्रों-दोनों के सहारे-जंगल की रात को जीवंत बना देती है।
“अँधेरे से एकदम भरी रात देखी, उजाले से एकदम भरी रात देखी…” जैसी पंक्तियाँ शब्दों के खेल और लय से एक अलग ही जादू रचती हैं। “ये किसका रफू था? ये किसने सिले थे?” जैसी शब्दावलियाँ और मुहावरे कविता को नई चमक देते हैं और उसके अर्थ में मिठास और गहराई जोड़ते हैं। काले-सफेद रेखाचित्र अपनी बारीकियों के साथ पाठक को रोक लेते हैं; हर पन्ने पर जंगल की अनुभूति-सन्नाटे, फुसफुसाहट और हल्की हलचल-को महसूस कराया जाता है। कविता बेहद संवेदनशील है, जो भाषा, ध्वनि और दृश्य-तीनों का मेल कर एक गहरा अनुभव पैदा करती है।
A motley group of travellers, family and friends, sets out for a week’s trek along the Ganga river. As the journey progresses, many truths are revealed in a gentle but firm manner. These two strands – the enduring yet fragile aspect of both nature and of human relationship are handled sensitively by the author. It is an affectionate and realistic picture of life as many of us know it. Look for the ending!
जानी मानी हस्तियों के बचपन के बारे में इस तरह से लिखी गयी है जैसे आत्मकथा लिखी जाती है। शैली एकदम सहज, बोधगम्य, और रोचक। संगीत, विज्ञान, सिनेमा, साहित्य, पक्षी-विज्ञान आदि क्षेत्रों से बड़ी हस्तियों के बचपन चुने गए हैं। बड़ों के बचपन को ज़रा भी रूमानियत से नहीं देखा गया है। लगभग हर बचपन में ऐसी कई अप्रिय बातें भी हैं जो आम तौर पर व्यक्ति छिपाने की कोशिश करता है। बड़े होने की प्रक्रिया में इस किताब का किसी युवा पाठक को मिल जाना एक सुखद और प्रेरणादायक अनुभव सिद्ध होगा।
यह हिन्दी की कालजयी बाल कविताओं का अनूठा संकलन है जहाँ वे कविताएँ भी हैं जिन्हें आज के बच्चों के दादा के दादाओं ने अपने बचपन में पढ़ा था और वैसी कविताएँ भी हैं जो पहली बार किसी संकलन में प्रकाशित हो रही हैं किंतु जिन सब को आज से सौ साल बाद भी इतने ही प्यार से पढ़ा और सुना जाएगा। यहाँ भाषा और शब्दों के खेल हैं, तुकों की अप्रत्याशित बंदिशें हैं और संगीत का धमाल है। आस पास का दैनन्दिन जीवन है तो आकाश पाताल की गप्पें भी। हर बच्चे, और हर सयाने, के हाथ में यह किताब होनी ही चाहिए।
यह भी एक अनूठी किताब है। इसे खुद बच्चों ने तैयार किया है। बातें भी उनकी हैं और साथ के चित्रांकन भी उनके या उनके साथियों के। ये कहानियाँ इस अर्थ में हैं कि इनमें कुछ न कुछ घटता है और खुद उनके साथ या उनके साथ के लोगों के साथ घटता है। ये अपने जीवन की सच्ची कहानियाँ हैं जिनमें कई तरह के खट्टे मीठे अनुभव हैं, फ़सल कटाई से लेकर स्टेशन पर खोने और अपनी भैंस की कहानी भी। ये पढ़ने वाले के भीतर प्रेम, दुलार और सच्चाई के भाव विकसित करती हैं।