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पाँच कहानियों का यह संकलन अलग अलग प्रसंगों और अनेक चरित्रों का समावेश करता है। एक कहानी तो स्कूल के शरारत भरे दिनों की पुनर्रचना करती है जबकि भौंकने वाले कुत्ते की करुण कथा पाठक को गमगीन कर देती है। ट्रेन के सफ़र का वाकया सुपरिचित होते हुए भी अनोखा लगता है। कहानियों की भाषा सुगम है। आमफहम शब्द और मुहावरे हैं। और अलग अलग इलाक़ों और तजुर्बों का ब्योरा है। चित्रांकन की अमूर्तन प्रविधि कथा को प्रशस्त और कल्पना को उन्मुक्त करती है।
यथार्थ, कल्पना, फैंटेसी और इंद्रजाल से बुनी ये कहानियाँ इतनी सम्मोहक हैं कि लगता है सब कुछ साक्षात घट रहा है। पहाड़ों, जंगलों के रहस्यमय संसार से लेकर क़स्बों के स्कूली वातावरण तक फैलीं ये कथाएँ जीवन के रोमांच और रहस्य का बखान हैं। चरवाहे, भेंड़ों और कुत्ते की कहानी, विचित्र भालू-नाखून की कहानी, सपनीली लड़की के लगातार बदलते जाने की हैरतअंगेज़ कहानी – सब की सब कहानियाँ परीकथाओं की तरह रोचक हैं। इनकी भाषा बेहद सर्जनात्मक है – ‘उसने खुशी के मारे जैसे खुद का ही एक चक्कर लगाया’। इसके चित्रों के कत्थई-भूरे रंगों की बहुतायत रहस्य-लोक को और भी सघन कर देती है।
इस लम्बी कहानी में एक कुशाग्र बालक बन्तू को उसकी नई कुर्सी अलग-अलग की मजेदार कहानियाँ सुनाती है। दोपहर की लोरी जैसी ये कहानियाँ उस पेड़ के खोखल में ‘टीटू किस्सेबाज़’ नामक चिड़िया की फेंकी हुई पोटली में थीं जिस पेड़ से यह कुर्सी बनी। लोककथाओं के जादुई शिल्प में रचित यह कथा भाषा के अनेक खेलों, कल्पना-उड़ानों और अलौकिक वर्णनों से सम्पन्न है। किस्सागोई के मजे तो हैं ही, भाषा ऐसी कि सुनने वाले को जगाए रखे। ख़ास बात ये कि हर चीज़ में एक कहानी छुपी होती है बशर्ते हम उसे सुनने की कोशिश करें, जैसे कि इस कुर्सी की, पेड़ की, चिड़िया की, बगीचे की कहानी-दर-कहानी।
पाथरूट का लक्ष्या: कौन हैं लक्ष्मण गायकवाड़?
यह किताब लक्ष्मण गायकवाड़, एक ‘आपराधिक’ घोषित जनजातीय समुदाय से आए लेखक के जीवन को गैर-रेखीय और संवेदनशील ढंग से सामने लाती है। कहानी उनके बचपन की घटनाओं को बच्चों के सवालों के साथ बुनती है, जिससे उनका सफ़र और भी साफ़ उभरता है। स्कूल में झेली गई ज़िल्लत, ग़रीबी, काम, आंदोलन और लिखने की ओर उनके सफ़र को बच्चों के सवालों के साथ बुनते हुए, यह पुस्तक हाशिये पर धकेले गए समुदायों के अनुभवों को महत्त्व देती है और बच्चों के साहित्य में नई आवाज़ों के लिए जगह खोलती है।
यह उपन्यास कल्पनाशीलता, स्वप्नशीलता और भाषा के जादुई प्रयोगों का अद्भुत उदाहरण है। पाखी नामक बच्ची के स्वप्नों, अनुभवों पर केंद्रित यह कथा एकरैखिक गति में नहीं वरन् चक्रीय गति में चलती है, इसलिए सभी अध्यायों को ताश के पत्तों की तरह फेंटा जा सकता है और कहीं से भी शुरुआत की जा सकती है। यह एक प्रयोगशील, परन्तु ऐन्द्रिक तंतुओं से बुनी हुई कथा है जिसे चित्रों और रंगों का संयोजन अतिरिक्त त्वरा प्रदान करता है। जीवन में सबसे ज़रूरी है कल्पनाशीलता और नित नवीन संयोजन का सामर्थ्य।
अत्यंत रोचक बाल उपन्यास पोंचू नाम के बच्चे की मनःस्थिति, उसकी कल्पना और उसकी स्वाभाविक जिज्ञासा की मैजिक रिअलिस्ट कथा पेश करता है। पोंचू एक जोखिम भरे पर बड़े दिलचस्प सफ़र पर निकल जाता है और उसके साथ अनेक रोमांचक घटनाएँ घटती हैं। ये सफ़र जीवन यात्रा का रूपक बन कर पोंचू को बहुत कुछ सिखाता है जिसमें जानकारी तो होती ही है, अनुभव और भावनाओं के मेल से मिले सबक़ भी होते हैं। अपने वास्तविक जीवन में मानसिक रूप से त्रस्त पोंचू, यात्रा के ज़रिये अपना खोया आत्मविश्वास वापस पाता है और सहज रूप से विज्ञान (बायो मिमिक्री समेत) से भी रूबरू होता है। किताब का रूपांकन तथा शैली प्रयोगात्मक और आकर्षक है और फंतासी का खूबसूरत नमूना पेश करती है।
बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद भोपाल शहर में देश के अन्य भागों की तरह साम्प्रदायिकता के नाग ने फन उठाया। गाँठ में लिखित विवरणों के बीच मौखिक बयान भी दर्ज किये गए हैं। इसमें एक स्वाभाविक आपसदारी के छिन्न भिन्न होने के प्रत्यक्ष साक्ष्य मिलते हैं। ऐसी हिंसा के तुरत और दूरगामी प्रभाव एक समाज को ऐसे तोड़ते हैं कि दोबारा शुरुआत के बाद भी एक गाँठ बनी रहती है।
काले सफ़ेद रेखा चित्रों से अलग लोगों की आवाज़ों को डिज़ाइन और चित्रों के माध्यम से ऐसे पेश किया गया है कि उनकी सच्चाई झलकती है। चित्र बहुत सी सूक्ष्म दृष्टि से आम ज़िन्दगी के उन पहलुओं को पकड़ते हैं जो साम्प्रदायिकता की हिंसा में ध्वस्त होते हैं।
यह किताब खिचड़ीपुर मोहल्ले और वहाँ के बाशिंदों का एक सजीव दस्तावेज़ है—उनकी ही आवाज़ में। किरदार, उनके दुख–सुख और रोज़मर्रा की बयानगी बिना किसी परत या सजावट के सामने आती है। गाज़ीपुर के कूड़ा पहाड़ के पास बसे रिहायशी इलाके में रहने वाले बच्चों की नज़र से शहर, मोहल्ला और उसका सामाजिक-सांस्कृतिक जगत खुलता है। लेखकों की विशेषता यह है कि वे अपने ही परिवेश से दूरी बनाकर उसे साफ़, बारीक और ईमानदार ढंग से रेखांकित करते हैं।