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एक कहानी – पुस्तक समीक्षा

‘एक कहानी’ सात कहानियों का संग्रह है। इन कहानियों के प्रकाशन ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि हिन्दी का बाल साहित्य न केवल वयस्क हो गया है बल्कि विश्व की श्रेष्ठ कृतियों के समकक्ष है। ये कहानियाँ बेहद दिलचस्प हैं और अपने कथानक, कहन शैली और भाषा के जादुई बर्ताव से पाठक को बाँध लेती हैं। हमारी रोज़-ब-रोज़ की दुनिया में रची-बसी होकर भी ये पढ़ने वालों को एक समानांतर लोक में ले जाती हैं। यहाँ लोककथाओं का आश्चर्यलोक है, परीकथाओं सरीखी मासूमियत है, और यथार्थवादी उपन्यासों जैसा दैनंदिन जीवन का सूक्ष्म अवलोकन है। समकालीन जीवन का स्याह और क्रूर पक्ष भी है। लेकिन हमेशा अच्छाई और भोलेपन की जीत होती है। यहाँ भाषा साधन से अधिक साध्य है और अपने आप में एक रोमांचक क्रीड़ा है।

संग्रह की पहली कहानी बचपन की एक याद को जीवंत करती है जहाँ कुछ दोस्त उड़ती हुई चील की उड़ती हुई परछाईं पर काग़ज़ के एक छोटे टुकड़े को जमाने का खेल खेलते हैं, इस उम्मीद में कि काग़ज़ एक रुपये के नोट में बदल जाएगा जो कि कभी हो नहीं पाता क्योंकि परछाईं कभी पकड़ में आती ही नहीं। यहाँ उड़ती-फिसलती परछाईं को पकड़कर काग़ज़ को रुपये में बदलने का का बालसुलभ विश्वास इन दोस्तों को मैदानों, ढलानों में भटकाता फिरता है। यहाँ महत्वपूर्ण है परछाईं का पीछा।

परछाईं को केन्द्र में रखकर इस संग्रह की सबसे लम्बी कहानी ‘एक कहानी’ भी रची गई है जो अपनी परिकल्पना, गठन और प्रसार में लोककथा की तरह है जहाँ परी की जगह एक मछुआरिन लड़की है जो एक अजनबी लड़की को क़ैद से आज़ाद कराती है उस लड़की की परछाईं के निवेदन और सहारे से। यह एक विलक्षण कहानी है। ऐसी कथा हिन्दी में पहले नहीं लिखी गयी। यह कथा बाहर की श्रेष्ठ कथाओं के समतुल्य मानी जा सकती है। चुग्गा नाम की लड़की अकेले नाम के जंगल में बहुत अकेली थी। उसकी परछाईं भी उसके साथ नहीं थी। जब उसकी परछाईं नदी के जल में पड़ी तो उसने उसे नदी के जल में छोड़ दिया और कहा कि वह जल पर बह कर जाए और जो मिले उसे व्यथा बताए और कहे कि कोई उसे छुड़ा ले। बहते बहते वह परछाईं एक आदिवासी मछुआरिन लोरमी के सामने आती है। और आख़िर में लोरमी पहरेदारों को चकमा देकर चुग्गा को छुड़ा ले जाती है। और चुग्गा को अपनी परछाईं फिर मिल जाती है। यहाँ महत्वपूर्ण है परी की जगह एक आदिवासी लड़की का होना। और मुक्ति का संघर्ष। पढ़ते हुए भी भाषा हमें सम्मोहित करते हुए कल्पना को स्वाधीन करती चलती है— ‘एक सुन्दर लड़की की सुन्दर परछाईं…जिसके नाक-नक्शे, पलकें तक साफ़ दिखें और दुखी होने पर आँखों में आँसू भी’।

‘मुक्ति’ और ‘हरे पत्ते के रंग की पतरंगी’ ऐसी कहानियाँ हैं जो बच्चों के रहस्यलोक को प्रगट करती हैं।पतरंगी नामक चिड़िया केवल उड़ते हुए बोलती है। उसी तरह एक लड़का केवल चलते हुए ही बोल सकता है। बैठने पर चुप हो जाता है और सबको लगता है वह कहीं खो गया है। वह पतरंगी संग उड़ते उड़ते बोलना चाहता है। यह बहुत दिलचस्प कहानी है। ‘मुक्ति’ भी स्टैच्यू या मूर्ति बनने वाले खेल के आधार पर बनी कहानी है जहाँ एक बच्चा अंत में सबको मुक्ति प्रदान करता है।प्रस्तुत कहानियों में मुक्ति और स्वाधीनता का स्वर प्रबल है जो सहज ही पूरी कथा में पेबस्त रहता है। बीच बीच में कविता का प्रयोग कहानी को लोककथा जैसी संरचना देता है।

‘छोटे चोर बड़े चोर’ अपनी विशिष्ट जादुई कहन शैली के साथ अभी के जीवन की विषमता और क्रूरता को व्यक्त करती है। लोहे के कबाड़ चुराने वाले बेहद गरीब लोग, इतने गरीब कि ‘इनको देखकर लगता कि क्या गरीब इतने भी गरीब होते हैं’। दूसरी तरफ़ अमीरों के महल हैं जो सबकी धूप छेंकते हैं। और एक डॉक्टर तो इतना दुष्ट है कि रोगी का इलाज न कर उसके घर को ख़रीदने की बात करता है। कहानी का अंत मार्मिक है। यह कहानी और ‘नूरजहाँ’ तथा सभी कहानियाँ हमें देखने और महसूस करने के नये तरीक़े बताती हैं। एक मामूली सा दृश्य सौन्दर्य से भर जाता है। हम हर वस्तु से प्रेम करने लगते हैं। ये कथाएँ हमें जीवन से प्यार करना सिखलाती हैं और स्वाधीनता, समानता तथा अहिंसा के मूल्यों में चुपचाप दीक्षित करती हैं। इन्हें पढ़ते हुए लगातार आनन्द मिलता है जो भाषा के कलात्मक व्यवहार और शब्द-कौतुक की देन है। ‘कौआ रातें’, ‘मैना रातें’, ‘नूरजहाँ एक आते हुए समय की तरह आ रही थी’, ‘कोकड़ा सेठ’, ‘पहरेदारों को केवल अपने ऊपर पहरा देना चाहिए, किसी दूसरे पर नहीं’, ‘कहीं मेरी किताब के पाठ से तो बिल्ली का बच्चा बाहर न निकल गया हो, अब पाठ में वापस कैसे जाएगा’—ऐसे मुहावरों-कथनों से पूरी किताब भरी है। कल्पनशीलता, फंतासी, जादुई यथार्थवाद और शब्दों का खेल इसकी मानक पहचान है—

मैंने आसमान की तरफ
चाबी का गुच्छा उछाला
तो आसमान खुल गया
ज़रूर मेरी कोई चाबी
आसमान से लगती है

यह किताब एक ऐसी चाबी है जो हर पाठक के आसमान से लगेगी।

‘एक कहानी’ विनोद कुमार शुक्ल की कहानियों का संग्रह है। इस किताब का चित्रांकन अतनु रॉय ने किया है। इकतारा के जुगनू प्रकाशन की यह किताब, पराग ऑनर लिस्ट २०२२ का हिस्सा है। आप इसे यहाँ से खरीद सकते हैं : https://www.ektaraindia.in/ektarashop/Ekahani?search=ek%20kahani

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बच्चों की किताबें अभी भी पढ़ता रहा,कुछ पत्रिकाएँ भी,और इनके लिए कुछ कुछ लिखता भी रहा।

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बच्चों के सामान्य और स्कूली जीवन में बाल साहित्य की अहमियत को सभी स्वीकारते हैं। बच्चों के चहुँमुखी व्यक्तित्व (समग्र) विकास में साहित्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

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