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अपने आस-पास परिवेश में या कहें तो वयस्क दुनिया में ‘भिन्न या अलग’ होना कितना स्वीकार्य होता है? मानवीय सम्बन्धों के बनते स्वरूप, निवास, कार्य, मन आदि में समानता खोजना एक सामान्य व्यवहार है। लेकिन भिन्न होना अस्वीकार्यता और असहिष्णुता की ओर ले जाता है। दुराव, अलग-थलग पड़ना, एकाकीपन, असामान्य व्यवहार जैसे कटु अनुभव मिलते हैं, जो कभी-कभी निर्ममता की हद तक चले जाते हैं। शारीरिक रूप से भिन्न होना ऐसे अनुभवों से अधिकतम दो चार करवाता है। कमोबेश हर उम्र में। चाहे वह बचपन हो या युवावस्था या बुढ़ापा।

सुंदर और स्वस्थ बचपन के लिए अपनेपन का एहसास और स्वीकृति आवश्यक है। बचपन में यह इतना आसान नहीं होता कि आप किसी समूह का हिस्सा बन पाएँ। किसी भी तरह की कोशिश एक चुनौती से कम नहीं होती। चाहे वह घर, मुहल्ले या स्कूल में बनने वाले बच्चों के समूह में या फिर वयस्क समाज में। लेकिन यह चुनौती तब और जटिल हो जाती है जब बच्चा ‘अलग’ दिखता हो या समझा जाता हो। शारीरिक भिन्नता बच्चों के बीच में भी बराबरी या सीखने के समान मौके की अवधारणा को प्रभावित करती है। इस वजह से ऐसे बच्चों को कोई सताता है, कोई उन पर धौंस जमाता है, कोई दया दिखाता है या फिर कोई अनदेखा कर देता है। बचपन के ये अजीब से एवं कटु अनुभव कहीं न कहीं आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं।

‘मेरी आँखें’ एक ऐसे ही अलग से बच्चे की कहानी है। जो बचपन में भैंगापन का शिकार है। हमारी दोनों आँखों में अच्छा समन्वय होता है। दोनों आँखें एक ही दिशा में और एक ही बिन्दु पर फोकस करती हैं। भैंगापन में यही नहीं हो पाता। मेरी आंखे में इस विषय को बहुत संवेदनशील तरीके (टेक्स्ट और चित्र दोनों में) दिखाया है। यह कहानी आत्मकथात्मक है। मुख्य पात्र अपने आस-पास की दुनिया में सहजता से शामिल होने के लिए संघर्षरत है।

कहानी की शुरुआत बहुत रोचक तरीके से होती है। पहले ही फ्रेम में मुख्य पात्र आईने के सामने खड़ा होकर कंघी कर रहा है। शायद स्कूल जाने की तैयारी है। आइने में उसके चेहरे का आधा हिस्सा ही प्रतिबिम्बित है। उसकी बहन उसे कागज़ के टुकड़े को रबर बैंड से मार रही है। पहला संवाद है “मेरी आँखों की एक दूसरे से बनती नहीं है।” (पृष्ठ 2-3)

दूसरे फ्रेम में उसके पिता उसे यूनिफॉर्म पहना रहे हैं। माँ उसकी बहन को कुछ समझा रही हैं। “मेरे पैदा होते ही ये रूठ गयी थीं। आजतक रूठी है।” दोनों ही प्रारम्भिक संवाद बहुत मजबूत हैं। हालांकि दोनों फ्रेम में बच्चे का चेहरा पूरी तरह नहीं दिखता। बावजूद कहानी खुद से जोड़ लेती है। बच्चे का स्वयं पर चुटकी लेता संवाद “उनका झगड़ा चल रहा है” कहानी का रुख तय करता लगता है। इन संवादों में बच्चे का व्यक्तिव तथा प्रकारांतर से उसका परिवेश, उसके पालन-पोषण के प्रति संवेदनशीलता एवं सजगता को प्रतिबिम्बित करता है। बच्चा खुद के ‘अलग होने’ को लेकर सजग है परन्तु इसे वह अपनी असमान्यता के रूप में नहीं लेता। इसमें उसके परिवार के सदस्य सहयोगी हैं।

अन्य लोगों का ‘अलग’ लोगों के प्रति क्या नज़रिया रहता है उसके बारे में यह किताब स्पष्टता से बात करती है। एक फ्रेम में बच्चे की माँ, उसे और उसकी बहन को साइकिल से स्कूल छोड़ने जा रही है। ट्रैफिक सिग्नल पर वे सब रुके हुए हैं। स्कूल बस, कार और पैदल चलने वाले सभी उसे अजीब नजरों से देख रहे हैं। ट्रैफिक लाइट पर बैठा कबूतर उनको देखकर आश्चर्य में है कि वे लोग उसे घूर-घूरकर क्यों देख रहे हैं। उसकी बहन नाराज है कि लोग ऐसे क्यों देख रहे हैं – वह बेचारा नहीं है।

किताब में ‘अलग’ बच्चे के परिवेश का उसके प्रति असामान्य व्यवहार को बहुत संजीदा तरीके से चित्रों के माध्यम से दिखाया गया है। बहन कहती है “ कभी डरना नहीं, आँखें नीची करना नहीं।“ वह खुद को मजबूत रखता है बावजूद इसके वह कभी-कभी परेशान भी हो जाता है। फिर भी इस परिवेश में कुछ ऐसे भी हैं जो उसके साथ असामान्य व्यवहार नहीं रखते। जिनके साथ वह खुश होता है।

ऐसे विषयों पर हिन्दी बाल साहित्य में कम ही किताबें प्रकाशित हुई हैं। लेकिन यह किताब मुद्दे को सही ढ़ंग से उभारती है एवं हमें अपने व्यवहार का पुनरावलोकन करने का मौका देती है

‘मेरी आँखें’ किताब की कहानी और चित्र दोनों बहुत प्रभावी हैं। जलरंग व स्केच से बने चित्र सामान्य दिखते हैं किन्तु अत्यंत बारीकी से कहानी का वितान समझते हैं। शब्दों के साथ साथ चित्रों मे भी वह संवेदनशीलता है, बच्चे के हाथ में एक किताब थमाते हुए हमे जिसकी उम्मीद रहती है।

रूम टू रीड प्रकाशन की अन्य किताबों की तरह इस किताब के अंत में बच्चों के साथ बातचीत एवं कहानी पर चर्चा की गतिविधि का विवरण दिया गया है। बच्चों से कहानी पर बातचीत के अंतर्गत यह बात लिखी है कि ऐसी कहानियाँ पाठकों में हमदर्दी के बीज बोने का महत्वपूर्ण काम करती हैं, खासकर तब जब वे अपनी उम्र के एक कोमल दौर से गुजर रहे होते हैं, जहां उन्हें आसानी से ढाला जा सकता है।

मेरे विचार से ये पंक्तियाँ किताब के मूल विचार के विपरीत जाती लगती हैं। इस तरह की कहानियों का उद्देश्य पाठकों को ऐसे अनुभवों से दो चार कराना है जिससे ‘अलग’ उनके लिए सामान्य लगे। इस बात को वे महसूस करें और आने वाले जीवन में अभ्यास में आयें। इसलिए हमदर्दी के बीज बोने वाली बात और बच्चों को कोमल दौर में आसानी से ढाले जा सकने वाली बात बेमानी और अनावश्यक जान पड़ती हैं।

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